Monday, April 19, 2010

तुम्हारा आना

कभी वक़्त मिले तो दुबारा आना मेरे पास और देखना कि
पहली बार आये तुम्हारे कदमोँ को मैनेँ कैसे सम्भाल कर रखा है
बिस्तर की सलवटोँ से लेकर काफी के जूठे मग में आज भी पडे हैं
तुम्‍हारे कदमों के निशान.

2 comments:

  1. तुम्हारी कविता में कशिश है, जुनून है। बेहद खामोशी से ये अपनी आगोश में ले जाती है।
    बहुत खूब।

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  2. sach me ye man ki hi kavitaye hain........

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