चारों ओर रेत ही रेत जैसे नीचे मैं और मेरा मनं कि जैसे नीरस उजाड़ मरूस्थल
ऊपर तुम और तुम्हारा तन कि जैसे अनंत अछोर आकाश
फिर भी मैं तुम और तुम मैं
हैं न कितने पास पास ।
सपनो के महल बनाता मेरा मन और तत्क्षण उन्हें uda ले जाती तुम से मुझ तक पहुँचने वाली हवा
बालू के चक्रवातों में घिरी मैं पहुँचती तुम तक और तुम ....तुम मुझे वापस भेज देते धरती पर बारिश की बूंदों के साथ
तुम अनंत पर मेरा अंत, मैं इति तुम शुरुआत .... ।
Sunday, April 25, 2010
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uda le jaati ke baad ek comma aur behtar bana deti.bahut acche expressions hain
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