एक बेकरारी है जिसका दरया मुझे बहा ले जाना चाहता है ....
लहरें हैं जो जूनून में मुब्तला करती हैं...
ग़ालिब हैं जो इश्क की नाकाम उम्मीदें मेरे जागते बदन में जगा कर सो जाते हैं....
क्या है यह ....
कभी समझ नहीं पायी आज तक ...
कहीं इश्क तो नहीं....
Sunday, April 25, 2010
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