तुम विशाल मंदराचल हो
अगणित रहस्योरत्न से परिपूर्ण कहीं अमृत तो कहीं हलाहल हो
मैं शेषनाग बनकर तुम्हारा मंथन करना चाहती हूँ
पिला सुधोपय स्वयं हलाहल पान करना चाहती हूँ
पर
तुम्हारे मंथन के क्रम में मैं स्वयं मथित हो जाती हूँ
घिसती चली जाती हूँ
अंततः तुम ही गरल का पान करके
मुझे पीयूषमय बनाके
हलाहल मुक्त करके, अमृतयुक्त करके
मेरा ही मंथन कर डालते हो
मेरे अंतर के उच्छवासोंको उद्घाटित कर डालते हो
तुम्हे समझना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन सा लगता है
क्यूंकि शायद तुम मंथर हो
Sunday, May 23, 2010
टूटना
जब भी रोकना चाहती हूँ अविरल जलधार को
आंसुओं का सैलाब उमड़ आता है
करना चाहती हूँ अनंत सब्र पर सब्र का बाँध टूट ही जाता है
जब जब भी आती है साहिल को तोडकर जलधार
हर बार मेरा पूरा अस्तित्व बह जाता है
मन की रेत पर बने सपनो के घरौंदों को पानी अपनी ठोकरों से तोड़ जाता है
हर बार टूटने के बाद जुड़ना कितना कठिन है
कोई यह कहाँ समझ पाता है.
आंसुओं का सैलाब उमड़ आता है
करना चाहती हूँ अनंत सब्र पर सब्र का बाँध टूट ही जाता है
जब जब भी आती है साहिल को तोडकर जलधार
हर बार मेरा पूरा अस्तित्व बह जाता है
मन की रेत पर बने सपनो के घरौंदों को पानी अपनी ठोकरों से तोड़ जाता है
हर बार टूटने के बाद जुड़ना कितना कठिन है
कोई यह कहाँ समझ पाता है.
निष्कर्ष
सागर की लहरों की तरह पत्थरों से टकरा - टकरा कर मैं टूट रही हूँ और
निरंतर टूट रही हूँ
इस क्रम में अपनी ज़िन्दगी से भी रूठ रही हूँ
इस घुटन का जब चरमोत्कर्ष होगा
वही मेरे जीवन का निष्कर्ष होगा.
निरंतर टूट रही हूँ
इस क्रम में अपनी ज़िन्दगी से भी रूठ रही हूँ
इस घुटन का जब चरमोत्कर्ष होगा
वही मेरे जीवन का निष्कर्ष होगा.
Sunday, April 25, 2010
कहीं इश्क तो नहीं
एक बेकरारी है जिसका दरया मुझे बहा ले जाना चाहता है ....
लहरें हैं जो जूनून में मुब्तला करती हैं...
ग़ालिब हैं जो इश्क की नाकाम उम्मीदें मेरे जागते बदन में जगा कर सो जाते हैं....
क्या है यह ....
कभी समझ नहीं पायी आज तक ...
कहीं इश्क तो नहीं....
लहरें हैं जो जूनून में मुब्तला करती हैं...
ग़ालिब हैं जो इश्क की नाकाम उम्मीदें मेरे जागते बदन में जगा कर सो जाते हैं....
क्या है यह ....
कभी समझ नहीं पायी आज तक ...
कहीं इश्क तो नहीं....
मैं इति, तुम शुरुआत
चारों ओर रेत ही रेत जैसे नीचे मैं और मेरा मनं कि जैसे नीरस उजाड़ मरूस्थल
ऊपर तुम और तुम्हारा तन कि जैसे अनंत अछोर आकाश
फिर भी मैं तुम और तुम मैं
हैं न कितने पास पास ।
सपनो के महल बनाता मेरा मन और तत्क्षण उन्हें uda ले जाती तुम से मुझ तक पहुँचने वाली हवा
बालू के चक्रवातों में घिरी मैं पहुँचती तुम तक और तुम ....तुम मुझे वापस भेज देते धरती पर बारिश की बूंदों के साथ
तुम अनंत पर मेरा अंत, मैं इति तुम शुरुआत .... ।
ऊपर तुम और तुम्हारा तन कि जैसे अनंत अछोर आकाश
फिर भी मैं तुम और तुम मैं
हैं न कितने पास पास ।
सपनो के महल बनाता मेरा मन और तत्क्षण उन्हें uda ले जाती तुम से मुझ तक पहुँचने वाली हवा
बालू के चक्रवातों में घिरी मैं पहुँचती तुम तक और तुम ....तुम मुझे वापस भेज देते धरती पर बारिश की बूंदों के साथ
तुम अनंत पर मेरा अंत, मैं इति तुम शुरुआत .... ।
Tuesday, April 20, 2010
मन की कविता ही क्यूँ
इस ब्लॉग का नाम मैंने मन की कविता इसलिए रखा है क्योंकि यदि सूक्ष्म अन्वेषण किया जाए तो आज कविता मन या दिल या यूँ कहें कि स्वान्तः सुखाये के लिए ही लिखी जा रही है कोई प्रकाशक कविता छापना नहीं चाहते
Monday, April 19, 2010
तुम्हारा आना
कभी वक़्त मिले तो दुबारा आना मेरे पास और देखना कि
पहली बार आये तुम्हारे कदमोँ को मैनेँ कैसे सम्भाल कर रखा है
बिस्तर की सलवटोँ से लेकर काफी के जूठे मग में आज भी पडे हैं
तुम्हारे कदमों के निशान.
पहली बार आये तुम्हारे कदमोँ को मैनेँ कैसे सम्भाल कर रखा है
बिस्तर की सलवटोँ से लेकर काफी के जूठे मग में आज भी पडे हैं
तुम्हारे कदमों के निशान.
Subscribe to:
Comments (Atom)