तुम विशाल मंदराचल हो
अगणित रहस्योरत्न से परिपूर्ण कहीं अमृत तो कहीं हलाहल हो
मैं शेषनाग बनकर तुम्हारा मंथन करना चाहती हूँ
पिला सुधोपय स्वयं हलाहल पान करना चाहती हूँ
पर
तुम्हारे मंथन के क्रम में मैं स्वयं मथित हो जाती हूँ
घिसती चली जाती हूँ
अंततः तुम ही गरल का पान करके
मुझे पीयूषमय बनाके
हलाहल मुक्त करके, अमृतयुक्त करके
मेरा ही मंथन कर डालते हो
मेरे अंतर के उच्छवासोंको उद्घाटित कर डालते हो
तुम्हे समझना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन सा लगता है
क्यूंकि शायद तुम मंथर हो
Sunday, May 23, 2010
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