Sunday, May 23, 2010

मंथन

तुम विशाल मंदराचल हो
अगणित रहस्योरत्न से परिपूर्ण कहीं अमृत तो कहीं हलाहल हो
मैं शेषनाग बनकर तुम्हारा मंथन करना चाहती हूँ
पिला सुधोपय स्वयं हलाहल पान करना चाहती हूँ
पर
तुम्हारे मंथन के क्रम में मैं स्वयं मथित हो जाती हूँ
घिसती चली जाती हूँ
अंततः तुम ही गरल का पान करके
मुझे पीयूषमय बनाके
हलाहल मुक्त करके, अमृतयुक्त करके
मेरा ही मंथन कर डालते हो
मेरे अंतर के उच्‍छवासोंको उद्घाटित कर डालते हो
तुम्हे समझना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन सा लगता है
क्यूंकि शायद तुम मंथर हो

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