इस ब्लॉग का नाम मैंने मन की कविता इसलिए रखा है क्योंकि यदि सूक्ष्म अन्वेषण किया जाए तो आज कविता मन या दिल या यूँ कहें कि स्वान्तः सुखाये के लिए ही लिखी जा रही है कोई प्रकाशक कविता छापना नहीं चाहते
Tuesday, April 20, 2010
Monday, April 19, 2010
तुम्हारा आना
कभी वक़्त मिले तो दुबारा आना मेरे पास और देखना कि
पहली बार आये तुम्हारे कदमोँ को मैनेँ कैसे सम्भाल कर रखा है
बिस्तर की सलवटोँ से लेकर काफी के जूठे मग में आज भी पडे हैं
तुम्हारे कदमों के निशान.
पहली बार आये तुम्हारे कदमोँ को मैनेँ कैसे सम्भाल कर रखा है
बिस्तर की सलवटोँ से लेकर काफी के जूठे मग में आज भी पडे हैं
तुम्हारे कदमों के निशान.
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