Thursday, December 20, 2012
यादें
यादें
ये तुम्हारी यादें हैं या पॉलीथीन
जो जलाए नहीं जलतीं
गलाए नहीं गलतीं
पैरों में उलझ जाएँ तो छुड़ाए नहीं छूटतीं.
एक बार इन्हें जलाकर देखा
जल कर बगूले बनकर उठीं ज़रूर
पर, धुंआ बनकर मेरी ही आँखों में भर गईं
और उन्हें जलाने लगीं
आंसू बनकर निकलीं भी नहीं
काजल बनकर मेरी आँखों में भर गईं और अपनी ही नज़र मुझे लगाने लगीं
दोबारा इन्हें गलाने की कोशिश की
गंगा में बहाया तो किनारे पर जाकर लग गईं
यमुना में बहाया तो कीचड़ में सन कर रह गईं
उनपर दलदल की काली परत चढ़ गई पर....
उन्होंने अपना वजूद बनाये रखा.
न जलीं, न गलीं, न मिटीं
मेरे ही पैरों में उलझकर वृत्ताकार घूर्णन करती रह गईं
कई बार इन्हें अपने से अलग करने की कोशिश की
पर एक पैर से छूटकर दूसरे पैर में चिपक गईं
हवा में उड़ाया तो मेरे ही पीछे पड़ गईं
मेरे साथ-साथ, मेरे ही आस -पास उड़ती रहीं
अभी भी इनसे पीछा छुड़ाना चाहती हूँ
पर......ये कमबख्त ऐसी यादें हैं
कि पीछा ही नहीं छोड़ती.
- © मंजरी श्रीवास्तव
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यादों से खाली घर और भी भुतहा हो जाता है...
ReplyDeleteइन्हें पलने दें मन के किसी कोने में...
:-)
अनु